बेहद सफल और शानदार रहा संस्कार ज्ञानपीठ का ऑनलाईन कवि सम्मेलन

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* पालकों सहित गुरूजनों ने एक से बढ़कर एक स्वरचित रचनाएं सुनाईं
* होली के पर्व पर प्राचार्य प्रशांत धर्माधिकारी ने साकार की अनूठी संकल्पना
* हिंदी व मराठी सहित व:हाडी कविताओं से सजी महफिल

व-हाड दूत न्युज नेटवर्क

खामगांव: उच्चतम स्तर की शिक्षा के क्षेत्र में लब्ध प्रतिष्ठित माने जाते संस्कार ज्ञानपीठ को ज्ञानदान के साथ ही हमेशा ही लीक से हटकर सबसे अलग सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करने हेतु भी जाना जाता है.
अपनी इसी परंपरा को कायम रखते हुए इस वर्ष होली के पर्व पर संस्कार ज्ञानपीठ द्वारा अपनी तरह का बेहद अनूठा ऑनलाईन हिंदी-मराठी कवि सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें संस्कार ज्ञानपीठ में पढऩेवाले विद्यार्थियों के अभिभावकों सहित शाला के शिक्षकों ने एक से बढ़कर एक अपनी स्वरचित काव्य प्रस्तुति दी. संस्कार ज्ञानपीठ के प्राचार्य प्रशांत धर्माधिकारी की संकल्पना से साकार हुए इस कवि सम्मेलन के जरिए शाला के शिक्षकों सहित कई अभिभावकों के कवि गुण को प्रोत्साहन मिला और उन्होंने बड़े उत्साह के साथ इस आयोजन में अपनी काव्य प्रस्तुति देकर आयोजन को शानदार ढंग से सफल बनाया.
संस्कार ज्ञानपीठ द्वारा इस कवि सम्मेलन का आयोजन गुगल मीट प्लेटफॉर्म के जरिए किया गया था, जिसकी अध्यक्षता प्राचार्य प्रशांत धर्माधिकारी ने की. वहीं इस आयोजन में बतौर प्रमुख अतिथि शाला के संचालक अमित कीर्तने, अमरावती के प्रख्यात साहित्यीक व व्यंग्यकार पवन नयन जायस्वाल तथा अमरावती के वरिष्ठ पत्रकार व कवि चंद्रप्रकाश दुबे ऑनलाईन उपस्थित थे. आयोजन का प्रारंभ सरस्वती पूजन से किया गया. पश्चात शाला के संचालक अमित कीर्तने द्वारा आयोजन की प्रस्तावना रखते हुए इस कवि सम्मेलन में शामिल सभी मान्यवरों को होली पर्व की शुभकामनाएं दी गई. जिसके बाद आयोजन के अध्यक्ष प्राचार्य प्रशांत धर्माधिकारी की अनुमति से कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे शाला के मराठी विभाग प्रमुख प्रशांत जावले ने आयोजन की कमान संभाली और एक एक कर कवियों को काव्य पाठ हेतु आमंत्रित किया. साथ ही इस समय शाला की शिक्षिका साक्षी चौकसे व सोनाली बोबडे ने अतिथि परिचय देते हुए आयोजन में शामिल दोनों अतिथियों को कवियों से परिचित कराया.
इस समय सर्वप्रथम काव्यपाठ करते हुए संगीता चव्हाण ने अपनी रचना संस्कार ज्ञानपीठ के अधयापकों को समर्पित करते हुए सुनाई और कई ऐतिहासिक संदर्भों को जोड़ते हुए संस्कार ज्ञानपीठ पर शानदार काव्य प्रस्तुति दी. वहीं जयश्री उपाध्याय ने माँ पर रचित कविता सुनाते हुए कहा कि ‘मैंने देखा है अपनी माँ को, कभी घबराते कभी सकुचाते, कभी गंभीर कभी धीर, कभी रोते हुए कभी रात में सोते हुए.’ इस कविता ने सभी को भावविभोर कर दिया और आयोजन में शामिल कई मान्यवरों ने इस समय माँ से जुड़ी अपनी यादों को ताजा किया. साथ ही प्रमुख अति के तौर पर आयोजन में शामिल पवन नयन जयस्वाल ने इस पर प्रतिक्रिया स्वरूप अपनी रचना सुनाते हुए कहा कि ‘माँ, समक्ष तुम्हारे कागज, कलम, शब्द, शब्दकोष मौन सभी, भाषा परिभाषा मौन सभी, माँ तुम्हारी संपूर्ण परिभाषा लिख पाया कौन कभी.’ साथ ही पवन जायस्वाल ने इन पंक्तियों के सात सभी को होली के पर्व की शुभकामनाएं दी कि ‘धर्म की अधर्म पर, सत्य की असत्य पर, मानव की दानव पर जीत का पर्व है होली.’
इसके बाद गणेशराव राऊत ने ठेठ व:हाडी अंदाज में बाकमाल सुर के साथ माणूस शीर्षक के तहत काव्य पाठ करते हुए कहा कि ‘विश्वास कुणावर ठेवू, माणूस आज नाही, पशुसम वागणे सारे, थोड़ी ही लाज नाही.’ अपनी इस रचना के साथ गणेशराव राऊत ने लगातार नीचे गिर रहे नैतिक मूल्यों तथा खोती जा रही मानवता पर कवि हृदय की चिंता जाहीर की. लेकिन इसके पश्चात काव्यपाठ करने हेतु आए किशोर बुजाडे ने निसर्ग पर आधारित एक मराठी कविता प्रस्तुत करते हुए जीवन एवं दुनिया के लिए यह कहते हुए आशावाद जगाया कि ‘हृदयी वसू दे निसर्गा तुझी प्र्रेरणा, तव प्रेम दे, तव स्नेह दे, दे तव आशीष माझ्या मना.’
तदोपरांत काव्यपाठ हेतु प्रस्तुत हुई संगीता भोसले ने शिवकालीन इतिहास के साथ देश की आजादी के प्रसंगों को एक साथ पिरोते हुए बुलढाणा जिला, खामगांव शहर और संस्कार ज्ञानपीठ के शिक्षकों का नामोल्लेख करती हुई बेहतरीन काव्य प्रस्तुति दी. इस कविता से सभी लोग खासे प्रभावित भी हुए और सभी ने पहली बार काव्य रचना व काव्य पाठ करनेवाली संगीता भोंसले की मुक्तकंठ से प्रशंसा भी की. वहीं इस समय आयोजन का संचालन कर रहे प्रशांत जावले ने खुद के विवाह को कविता की विषयवस्तु बनाते हुए व्यंग्यात्मक ढंग से काव्य प्रस्तुति देते हुए कहा कि ‘कोई कसूर नहीं था मेरा सरजी, फिर भी मेरी शादी करा दी.’ वैवाहिक जीवन से जुड़े कई प्रसंगों को इस रचना में प्रशांत जावले ने बखूबी उकेरा.
इसके बाद इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए संस्कार ज्ञानपीठ के प्राचार्य प्रशांत धर्माधिकारी ने विवाह पर एक धीर-गंभीर रचना अपनी पत्नी स्मिता धर्माधिकारी के नाम पेश करते हुए कहा कि ‘दशक द्वयांच्या सहवासात ती तेजस्विनी राहिली, एकविसाव्या शतकांतही स्मिता मधे मी सीता पाहिली.’ पश्चात निधि शाह ने शिक्षा के महत्व को शानदार ढंग से रेखांकित करते हुए कविता प्रस्तुति दी कि ‘जो ख्वाब अधूरा है आँखों में, मिलकर साथ चलने का रंग चढ़ाकर देखेंगे, जहां पहुँची नहीं शिक्षा पूरी, जो विवश है पूरी करने में, कहीं स्कूल नहीं, कहीं राहें नहीं, कोई सक्षम नहीं पेट भरने में, एक हाथ बढ़ाकर उनको थामें, फिर साथ चलाकर देखेंगे.’
वहीं वैदेही चव्हाण ने आयोजन को एक बार फिर होली पर्व की ओर मोड़ते हुए मराठी काव्यपाठ किया कि ‘रंग उधळूनी चोहीकडे, होळी साजरी करू चला, सांज घालूनी रंगाचा, नवीन नाती जोडू चला.’ इसके बाद काव्यपाठ करने पधारी सुधा गौर ने एक नवोदित कवि की व्यथा को बखूबी साकार करते हुए कहा कि ‘औरों को देखकर उनका भी मन कवियित्री बनने ललचाया, लेकिन राष्ट्रपति के हाथों उनका इस शर्त पर सत्कार हुआ कि खबरदार फिर कभी कुछ लिखा या गाया.’ वहीं इसके बाद स्मिता पुरवार ने शानदार शब्दों से अलंकृत काव्यपाठ करते हुए कहा कि ‘खुद से जीतने की जिद है मुझे और खुद को ही हराना है, मैं भीड़ नहीं हूँ दुनिया की, मेरे अंदर एक जमाना है.’
पश्चात सुरेश राऊत ने मराठी कविता पेश करते हुए कहा कि ‘चालण्यासाठी वाट असते, वाटे साठी चालणे नसते, उंच भरारी घेणा:याला आभाळाचे भान नसते.’ साथ ही उन्होंने ‘या आईसाहेब’ कविता प्रस्तुत करते हुए वीर माता का भी बखान किया. पश्चात शीला अंभोरे ने भी एक मराठी कविता प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘नाही आज कुणालाच कुणाची जाण, विसरून गेले सर्व आप-आपले भान, परवाह ना राहिली इथे कुणास कुणाची, जखमेवर मीठ चोळणे झाली सवय जणांची.’ साथ ही शीतल सातपुते ने भी एक शानदार मराठी काव्य प्रस्तुति देते हुए कहा कि ‘आयुष्य वेलीवर झुलतांना, दु:ख कवेवर घ्यावे, उडवून सुखाचे अत्तर, रोज नव्याने फुलावे.’ साथ ही उन्होंने मौजूदा कोरोना की संक्रामक महामारी पर ‘असा कसा मायबाई’  शीर्षक तले एक मजेदार व:हाडी कविता भी प्रस्तुत की.
कवि सम्मेलन की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए सोनाली सोनटक्के ने काव्य पाठ किया कि ‘मैं मेरा जीवन बीताती गई, मैं हर मुश्किल का सामना करती गई,चाहे कम हो या जियादा, मैं हर बात को निभाती गई.’ वहीं रविंद्र जोशी ने जीवन जीने की कला पर मराठी कविता पेश करते हुए कहा कि ‘आयुष्य हे कसं जगावं, तर ते प्रत्येकाने आपल्या सोयीने जगावं, प्रत्येकाचे त:हा वेगवेगळ्या असतील, पण आयुष्य हे आयुष्य जगण्यासाठी जगावं.’ पश्चात काव्यपाठ हेतु पेश हुए पृथ्वीराज ठाकुर ने ऑनलाईन शिक्षा में आ रही दिक्कतों पर व्यंग्यात्मक रचना पेश करते हुए कहा कि ‘पिचकारी नाही अन नाही कुठे गुलाल, कोरोनाने सा:याची केली बड़ी उलाल, ऑनलाईन शिकती मुले लहान लहान, अन् ताकावर भागविती दुधाची तहान.’ इसके बाद आश्लेषा भोंसले ने जूते की आत्मकथा को काव्यात्मक ढंग से पेश किया. साथ ही इन पंक्तियों के साथ जूते के जरिए इंसानी फितरत पर तंज कसा कि ‘हमारा एक साथी खो जाता है, तो हम एक कदम भी चलते नहीं, तुम इंसानों की तरह हम कभी अपना पार्टनर बदलते नहीं.’
इसके उपरांत संस्कार ज्ञानपीठ की हिंदी विभाग प्रमुख ममता पालीवाल ने कोरोना काल में शिक्षकों की समस्यायों को मुखर करते हुए काव्यपाठ किया कि ‘कोरोना ने देखो मचाया कोहराम, सबका कर दिया जीना हराम, मजदूर-व्यापारी सब हैं बेहाल, शिक्षकों के तो मत ही पूछो हाल.’ वहीं सबसे अंत में अपना काव्य पाठ करते हुए कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि व पत्रकार चंद्रप्रकाश दुबे ने पति-पत्नी के सहजीवन का सौंदर्य और संभावित बिछोह का दर्द उकेरते हुए अपनी काव्य प्रस्तुति दी कि ‘जानता ये भी है और वो भी, कोई एक पहले जायेगा, हाथों में रहनेवाला हाथ किसी दिन छूट जायेगा, साथ छूटन जाने से डरते दो ही हैं, ये भी और वो भी.’  इसके पश्चात संस्कार ज्ञानपीठ के प्राचार्य प्रशांत धर्माधिकारी ने इस कविसम्मेलन में बतौर कवि शामिल हुए सभी शिक्षकों व अभिभावकों सहित आयोजन के प्रमुख अतिथियों के प्रति आभार ज्ञापित करते हुए आयोजन की समाप्ति की घोषणा की और एक दूसरे से ऑनलाईन परिचित हुए सभी लोगों ने हालात के जल्द ही सामान्य होने तथा जीवन के किसी मोड़ पर एक दूसरे से रूबरी मिलने की कामना करते हुए एक-दूसरे से विदा ली.

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